Tuesday, May 28, 2019

湖北等地遇强降雨 消防救援队伍营救疏散被困群众650余人

  中新网5月28日电 据应急管理部微信公众号消息,近日,中国南方遭受强降雨天气,多地出现特大暴雨,湖北、广西、贵州等地消防救援队伍闻警即动,全力处置湖北武汉、黄石,广西桂林、东兴,贵州贵阳、安顺等地抗洪抢险救援220余起,先后出动消防车260余辆次、舟艇50余艘次、指战员2000余人次,营救和疏散群众650余人。

  应急管理部表示,受厄尔尼诺事件影响,中国今年入汛时间早,且入汛以来,南方部分地区降水量较常年同期偏多,一些河流发生超警戒水位洪水,防汛形势严峻。

  应急管理部称,各地针对因强降雨天气可能诱发城市内涝、山体滑坡、泥石流等灾情的实际,有针对性加大冲锋舟、橡皮艇、救生衣等防汛装备物资储配力度,抽调精干力量组成应急救援突击队,加强水面搜索、绳索救助、急流救援、溺水急救、强风抢险等专项技能训练,组织开展抗洪抢险、城市排涝、水域救助等实战演练,确保能够快速反应、科学施救,全力抢救遇险被困人员,最大限度地保护人民生命财产安全。

  广西消防救援总队修订跨区域抗洪抢险应急救援预案,组建17支水域救援专业队,在柳州市开展实战演练。贵州消防救援总队建立20支抗洪抢险机动中队,划定东、西、北部三大区域和1、2、4小时增援圈。湖北消防救援总队专题召开抗洪临战动员部署会,集中开展器材性能测试,对河流、湖泊、城市易涝点等情况摸底排查,全面做好救援准备。

  应急管理部指出,在抗洪抢险救援行动中,湖北、广西、贵州等地消防救援队,有力有序开展救援工作。5月26日2时30分许,湖北鄂州杜山镇发生内涝,指战员将被困7人全部救出,疏散群众30余人。26日0时30分许,广西桂林资源县中峰镇遭遇大暴雨,指战员克服山体滑坡、道路中断等复杂因素,安全转移疏散群众36人。25日至26日,贵州贵阳多处发生严重积水,指战员昼夜奋战,营救群众80余人,疏散群众60余人。26日7时40分,贵州安顺夏云镇毛栗园村突发洪水,大量人员被困,指战员及时赶到,营救被困群众66人。期间,全体指战员严格落实水域救援纪律要求和操作规程,坚决杜绝盲目冒险作业,确保了救援行动安全。

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Tuesday, May 21, 2019

आरएसएस ने महात्मा गांधी को दिल से स्वीकार किया है?

हाल ही में साध्वी प्रज्ञा सिंह ने कहा कि "नाथूराम गोडसे देशभक्त थे, देशभक्त हैं और देशभक्त रहेंगे. उन्हें आतंकवादी कहने वालों को अपने गिरेबां में झांकने की ज़रूरत है और चुनावों में इन लोगों को हम करारा जवाब देंगे."

वे भोपाल लोकसभा क्षेत्र से भाजपा की उम्मीदवार हैं.

इस बयान के बाद बीजेपी ने कहा है कि इस बयान से वो सहमत नहीं है और कहा कि साध्वी को माफ़ी मांगनी होगी. उसके बाद साध्वी ने माफ़ी भी मांगी.

एक ओर, बीजेपी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक आरएसएस गांधी का रोज़ नाम लेते हैं.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तो गांधी की विचारधारा को ध्यान में रखकर स्वच्छ भारत अभियान की शुरुआत की.

वरिष्ठ पत्रकार निखिल वागले कहते हैं कि आरएसएस ने गांधी को अपनी सुविधा के अनुसार स्वीकार किया है.

वो कहते हैं, "आरएसएस को जिस दिन गांधी प्रातःस्मरणीय होंगे, उस दिन संघ संघ नहीं रह जाएगा. इसलिए अगर संघ गांधी की विचारधारा को स्वीकार करेगा तो वो हिंदू राष्ट्र पर ज़ोर नहीं देगा. इसका एक मतलब ये भी है कि संघ केवल दिखाने के लिए गांधी का नाम लेता है.

सरदार वल्लभभाई पटेल ने गुरु गोलवरकर को लिखे पत्र में, साफ़ तौर पर लिखा है कि गांधी की हत्या के लिए देश में जो ज़हरीला वातावरण बना है उसके लिए आरएसएस ज़िम्मेदार है."

उन्होंने आगे लिखा है, "संघ ने गांधी को केवल सुविधा के तौर पर स्वीकार किया है. क्योंकि उसे महसूस हो गया है कि गांधी की हत्या के बाद भी वो मरे नहीं."

लेकिन भाजपा ने प्रज्ञा सिंह ठाकुर जैसे आतंकवाद के आरोपी को टिकट देकर ये साबित कर दिया है कि वो गांधी पर भरोसा नहीं करती."

"प्रज्ञा सिंह गोडसे को देशभक्त कहती हैं. ये कोई अचानक प्रतिक्रिया नहीं है. यह आरएसएस की व्यापक साजिश का हिस्सा है. गोडसे को लेकर आरएसएस समय-समय पर राष्ट्रीय भावना टटोलता रहा है. गोडसे आतंकवदी नहीं हत्यारा है, यह चर्चा भी उसी साजिश का एक हिस्सा है. हिंदू राष्ट्र बनाने के लिए संघ जो माहौल बना रहा है, ये भी उसी का हिस्सा है. इसलिए गोडसे संघ के लिए प्यारे हैं न कि गांधी."

'आलोचना करने वाले सबूत दें'
आरएसएस के पश्चिम क्षेत्र के प्रचार प्रमुख प्रमोद बापट कहते हैं कि आरएसएस की गांधी भक्ति झूठी है ये कहने वालों को इसका सबूत देना चाहिए.

वो कहते हैं, "आरएसएस की गांधी भक्ति झूठी है, आरएसएस को नाथूराम गोडसे प्यारे हैं, ऐसा कुछ लोग कहते रहे हैं. ऐसा कहने वाले सबूत नहीं देते. वो ये बात किस आधार पर कह रहे हैं, वे ये नहीं बताते."

बापट कहते हैं, "आरएसएस को गांधी कितने प्यारे हैं, ये किसी को बताने की ज़रूरत नहीं है. आरएसएस के मन में गांधी के बारे में जो भावना है, वो किसी को दिखाने की ज़रूरत नहीं है. हमें जो लगता है उसी आधार पर समाज में काम करते हैं. और समाज इसे स्वीकार करता है, ये पर्याप्त है. हम समाज के लिए प्रतिबद्ध हैं.

ये पूछने पर कि क्या ऐसे बयान हिंदू राष्ट्र के निर्माण के मकसद से दिए जा रहे हैं, बापट ने कहा, "नाथूराम गोडसे के बारे में ये बयान राजनीतिक दलों के कुछ लोग कर रहे हैं. संघ नहीं कह रहा है. इसका जवाब उन्हीं लोगों से लेना चाहिए."

गांधी की हत्या और आरएसएस
महात्मा गांधी की हत्या के तार आरएसएस से भी जोड़े जाते रहे हैं. नवजीवन प्रकाशन अहमदाबाद से प्रकाशित गांधी के निजी सचिव रहे प्यारेलाल नैयर ने अपनी किताब 'महात्मा गांधी: लास्ट फ़ेज' (पृष्ठ संख्या-70) में लिखा है, ''आरएसएस के सदस्यों को कुछ स्थानों पर पहले से निर्देश था कि वो शुक्रवार को अच्छी ख़बर के लिए रेडियो खोलकर रखें. इसके साथ ही कई जगहों पर आरएसएस के सदस्यों ने मिठाई भी बांटी थी.''

गांधी की हत्या के दो दशक बाद आरएसएस के मुखपत्र 'ऑर्गेनाइज़र' ने 11 जनवरी 1970 के संपादकीय में लिखा था, ''नेहरू के पाकिस्तान समर्थक होने और गांधी जी के अनशन पर जाने से लोगों में भारी नाराज़गी थी. ऐसे में नथूराम गोडसे लोगों का प्रतिनिधित्व कर रहे थे, गांधी की हत्या जनता के आक्रोश की अभिव्यक्ति थी.''

गांधी की हत्या से जुड़े कुछ और तथ्य सामने आने के बाद सरकार ने 22 मार्च 1965 को एक जाँच आयोग का गठन किया. 21 नवंबर 1966 को इस जाँच आयोग की ज़िम्मेदारी सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस जेएल कपूर को दी गई.

कपूर आयोग की रिपोर्ट में समाजवादी नेता जयप्रकाश नारायण, राममनोहर लोहिया और कमलादेवी चटोपाध्याय की प्रेस कॉन्फ़्रेंस में उस बयान का ज़िक्र है जिसमें इन्होंने कहा था कि 'गांधी की हत्या के लिए कोई एक व्यक्ति ज़िम्मेदार नहीं है बल्कि इसके पीछे एक बड़ी साज़िश और संगठन है'. इस संगठन में इन्होंने आरएसएस, हिन्दू महासभा और मुस्लिम लीग का नाम लिया था.

गांधी की अंत्येष्टि के ठीक बाद 31 जनवरी को कैबिनेट की बैठक बुलाई गई. इस बैठक में कैबिनेट के सीनियर मंत्री, बड़े अधिकारी और पुलिस के लोग शामिल थे. इसमें आरएसएस और हिन्दू महासभा को प्रतिबंधित करने का फ़ैसला लिया गया.

'आरएसएस अब गांधीवादी बन गया है'
नथुराम गोडसे के भाई गोपाल गोडसे ने 28 जनवरी, 1994 को फ्रंटलाइन को दिए इंटरव्यू में कहा था, ''हम सभी भाई आरएसएस में थे. नथूराम, दत्तात्रेय, मैं ख़ुद और गोविंद. आप कह सकते हैं कि हम अपने घर में नहीं, आरएसएस में पले-बढ़े हैं. आरएसएस हमारे लिए परिवार था. नथूराम आरएसएस में बौद्धिक कार्यवाह बन गए थे. नथूराम ने अपने बयान में आरएसएस छोड़ने की बात कही थी. उन्होंने यह बयान इसलिए दिया था क्योंकि गोलवलकर और आरएसएस गांधी की हत्या के बाद मुश्किल में फँस जाते, लेकिन नथूराम ने आरएसएस नहीं छोड़ा था.''

इसी इंटरव्यू में गोपाल गोडसे से पूछा गया कि आडवाणी ने नथूराम के आरएसएस से संबंध को ख़ारिज किया है तो इसके जवाब में उन्होंने कहा, ''वो कायरतापूर्ण बात कर रहे हैं. आप यह कह सकते हैं कि आरएसएस ने कोई प्रस्ताव पास नहीं किया था कि 'जाओ और गांधी की हत्या कर दो', लेकिन आप नथूराम के आरएसएस से संबंधों को ख़ारिज नहीं कर सकते. हिन्दू महासभा ने ऐसा नहीं कहा. नथूराम राम ने बौद्धिक कार्यवाह रहते हुए 1944 में हिन्दू महासभा के लिए काम करना शुरू किया था.''

Tuesday, May 14, 2019

1857 का गदर: क़िस्सा उस अंग्रेज़ ब्रिगेडियर का जिसे गोली मारी गई थी

सन 1857 के सिपाही विद्रोह की तारीख (11 मई) नज़दीक आते ही उन भारतीय और ब्रिटिश लोगों का ध्यान आता है जिन्होंने इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी.

हालांकि उनमें से कई लोग दूसरे खेमे से जुड़े हुए थे. इनमें एक नाम ब्रिगेडियर जनरल जॉन निकोल्सन का भी था जिनकी भरी जवानी में तकलीफ़देह मौत हो गई थी.

लेकिन ईस्ट इंडिया कंपनी को चाहने वाले लोगों के बीच जॉन निकोल्सन का दर्जा एक हीरो की तरह था.

इस बात पर यक़ीन करना एक पल के लिए तो मुश्किल लगता है कि आयरलैंड के इस फ़ौजी अफसर का स्मारक दिल्ली में एक धरोहर स्थल बन सकता है.

पर पिछले 162 बरसों के दौरान दिल्ली में निकोल्सन के स्मारक की स्थिति कुछ ऐसी ही हो चुकी है.

हर साल 11 मई और 14 और 19 सितंबर को पर्यटक और ब्रिगेडियर जनरल जॉन निकोल्सन के ख़ानदान के लोग इसी स्थान पर उन्हें श्रद्धांजलि देने आते हैं.

निकोल्सन ने 1857 के सिपाही विद्रोह के दौरान दिल्ली पर क़ब्ज़ा करने वाले विद्रोहियों से उसे छुड़ाने में अहम भूमिका निभाई थी.

हालांकि इस अभियान में निकोल्सन को अपनी जान गंवानी पड़ी, लेकिन इस युद्ध में उन्होंने एक ऐसे हीरो का दर्जा प्राप्त कर लिया था.

वो अपने देशवासियों के बीच ही नहीं बल्कि 'मुल्तानी हॉर्स' (ब्रितानी फौज की एक इकाई) में शामिल भारतीय सैनिकों के बीच भी बहुत लोकप्रिय थे.

उनकी निष्ठुरता से लेकर उनके नेतृत्व कौशल के बारे में भी कई किस्से कहे सुने जाते रहे हैं.

निकोल्सन के बारे में तमाम साहित्य उपलब्ध हैं लेकिन हाल ही में प्रकाशित हुई एक किताब में उन पर अच्छी रोशनी डाली गई है.

स्टुअर्ट फ्लिन्डर्स ने अपनी किताब 'कल्ट ऑफ़ ए डार्क हीरोः निकोल्सन ऑफ़ दिल्ली' के लिए उस रास्ते को खोजा जिसे निकोल्सन ने दिल्ली पर धावा बोलने के लिए चुना था.

इस किताब से ये पता चला कि भले ही अब तक दिल्ली का नक़्शा काफी कुछ बदल चुका है लेकिन इसमें उस दौर के कुछ महत्वपूर्ण ऐतिहासिक निशान अभी भी बचे हुए हैं.

स्टुअर्ट ने रिंग रोड की तरफ से पुरानी दिल्ली का चक्कर लगाया, इस दौरान नष्ट हो चुकी पुराने शहर की दीवार से होते हुए कश्मीरी गेट पहुंचे जिसका गुंबद अभी भी है जबकि बर्न बैस्टियन और लाहौरी गेट का अब वजूद नहीं है.

उन्हें संगमरमर के स्मारक की वह पट्टिका भी नहीं मिली जो निकोल्सन को गोली मारे जाने वाले स्थान की ओर संकेत देती थी.

हालांकि क़रीब 10 साल पहले मैंने 'विद्रोह' से जुड़े स्थानों और अंत में खारी बावली ले जाने के लिए ब्रिटिश नागरिकों के एक ग्रुप का नेतृत्व किया था.

काफ़ी खोजने के बाद हम एक संकरी गली में पहुंचे जहां कुछ लोग बर्फ़ और दूसरा सामान बेच रहे थे.

पहले तो वे समझ ही नहीं सके कि आख़िर हम क्या चाहते हैं लेकिन तमाम तरह की सफाई देने के बाद उन्होंने अपने पीछे की दीवार से एक टाट का टुकड़ा हटाया और वहां स्मारक पट्टिका नजर आई.

ऐसा लगता है कि ये वो पट्टिका नहीं थी जो ब्रितानी दौर में लगाई गई थी लेकिन वो आज़ादी के बाद लगाई गई एक अनुकृति थी.

इसमें निकोल्सन का ज्यादा गुणगाान तो नहीं था लेकिन इसमें उस अचूक निशानेबाज की तारीफ की गई थी जिसने एक दोमंज़िले मकान की खिड़की से निकोल्सन को उस वक्त गोली मारी थी जब वह लाहौरी गेट पर धावा बोलने के दौरान अपने जवानों का नेतृत्व करते हुए हवा में तलवार लहरा रहा था.

निकोल्सन के नाम पर बनाए गए पार्क के अब अवशेष ही बचे हुए थे लेकिन जिस कब्रिस्तान में उन्हें दफनाया गया था, उसके आस-पास चुनिंदा रातों में निकोल्सन का सिरविहीन धड़ घूमते हुए नज़र आने की कहानियां सुनने को मिला करती थीं.

ये कहानियां कई सवाल पैदा करती थीं क्योंकि निकोल्सन का सिर कलम नहीं किया गया था, उन्हें पीछे से गोली मारी गई थी और उनका सिर धड़ से अलग नहीं हुआ था.

इसी से जुड़ी एक और कहानी एक गोरी महिला के बारे में है, जो कभी-कभी आधी रात के बाद कश्मीरी गेट पर नजर आती हैं जहां लगी एक पट्टिका सही-सलामत है.

इसमें ब्रिटिश सैनिकों द्वारा गेट पर धावा बोलने और इस हमले के दौरान मारे गए व्यक्तियों के बारे में जानकारी है.

निकोल्सन की प्रतिमा को साल 1952 में आयरलैंड भेजने का फैसला लिए जाने से पहले तक इस पट्टिका के ठीक सामने लगी हुई थी.

गोरी महिला सिगरेट पीते दिखाई पड़ती हैं, जिसका मतलब है कि वो 'विद्रोह' के समय की नहीं है.

वो संभवतः बाद के किसी समय की है जो कश्मीरी गेट पर किसी हताश प्रेमी या फिर रात में किसी चोर के हाथों मारी गई थीं.

इसमें कोई शक नहीं कि निकोल्सन यहाँ तस्वीर में फिट नहीं बैठते हैं. वैसे भी वो स्त्रियों के चहेते पुरुष नहीं थे.

निकोल्सन की ज़िंदगी में रोमांस कितना रहा होगा, इसके बारे में कोई पक्की जानकारी नहीं है लेकिन इसके बावजूद इसी तरह से कहानियां गढ़ी जाती रहीं.

इस तरह निकोल्सन के कथित प्रेत को अपने ही देश की एक महिला के साथ जोड़ने की कहानी शुरू हुई.

Thursday, May 9, 2019

Принц Гарри и Меган назвали своего сына Арчи Харрисон

Герцог и герцогиня Сассекские Гарри и Меган впервые показали публике своего первенца, который родился в понедельник 6 мая. Назвать его решили Арчи Харрисон Маунтбеттен-Виндзор.

"У него милейший характер, он очень спокойный. Он просто мечта", - сказала Меган о своем сыне, который появился на кадрах завернутым в белое одеяло.

Гарри ответил ей: "Не знаю, от кого у него это", и родители засмеялись.

С младенцем уже познакомили королеву Елизавету II и принца Филиппа. Это восьмой правнук королевы.

"Это волшебство, удивительно. У меня есть два лучших парня в мире, и поэтому я очень счастлива", - сказала Меган о своих первых днях в роли матери.

"Прошло всего два с половиной дня, три дня, но мы просто в восторге от того, что у нас есть этот маленький кусочек радости", - говорят новоиспеченные родители.

Говоря о том, на кого из родителей мальчик похож больше, Гарри заметил: "Говорят, дети уже за пару недель сильно меняются. Посмотрим, как он будет меняться в первый месяц. Он каждый день меняется, так что кто знает".

Первенец герцогов Сассекских родился в 05:26 по британскому летнему времени в понедельник. Гарри заявил, что они с Меган "абсолютно в восторге" от него. При рождении младенец весил 3,2 килограмма - меньше, чем все его двоюродные братья и сестры.

Герцог Кембриджский Уильям - отец троих детей - сказал, что рад видеть своего брата в клубе "неспящих родителей". По его словам, он с нетерпением ждет встречи с молодыми родителями и знакомства с новорожденным племянником.

Принц Чарльз в ходе официального визита в Германию с герцогиней Корнуольской Камиллой сказал, что они рады новостям о новорожденном и с нетерпением ждут встречи с внуком.

В официальном заявлении также говорится, что мать Меган Дориа Рэгленд "радуется появлению первого внука" и находится с дочерью в коттедже Frogmore - резиденции семьи в Виндзоре.

Букингемский дворец заявил, что Гарри присутствовал при родах, которые, судя по всему, происходили в больнице, а не дома, как первоначально сообщалось.

Сын супругов Сассекских не станет принцем автоматически - хотя он может получить этот титул, если так решит королева.

Возможно, он унаследует один из титулов Гарри, например, графа Дамбартона, либо они могут вообще отказаться от королевского титула.

Monday, May 6, 2019

快蹄键盘:我们一百年不离不弃的秘密和启示

我左手小指按住上档键(shift,也称换档键),其它手指像螃蟹爪子一样横着爬向键盘的最上一排:Q-W-E-R-T-Y。

从这种操作中可以学到的经验是:键盘上,各键所在的位置很重要,排位有好有坏。

许多人认为,快蹄键盘的键位安排很糟糕,事实上,设计初衷就是为了让打字更难、更慢。

这是真的吗?三教九流各行各业的人当中,为什么经济学家围绕这个问题吵个不停?

但是,让我们先来搞明白,为什么有人如此"变态"、非要让打字速度更慢呢?

记得1980年代早期,我求了半天情,好不容易才说服妈妈把她的机械打字机借给我用。

那机器真神奇,我那笔糟糕透顶的烂字再也休想折磨我了。

敲下一个键,键盘后一个小杠杆翘起来,使劲击打墨带,把墨水打印到纸上。

杠杆的一端——打字杆——是一对反向字母。

我发现,如果同时击打几个键,打字杆会同时、全部跳到同一个点上。对于一个9岁的男孩来说,这可能很好玩。但对专业打字员来说,可就是另外一码事了。

每分钟打60字,很多打字员都做得到。这个速度意味着,每一秒钟就有5-6个键击打同一个点。为打字机考虑考虑,打字员可能需要降低速度。所以有人说,快蹄键盘起到的就是这种作用。

转念一想,如果快蹄真的是为降低打字速度而设计的,那么,为什么英语中最常用的一对字母T和H,恰好就安排在食指下面呢?

快蹄键盘之父是克里斯托弗·莱瑟姆·肖尔斯(Christopher Latham Sholes),这位威斯康辛的出版商在1868年将他设计的第一台打字机卖给芝加哥的波特电报学院

这一点非常重要。

快蹄排列的设计初衷是为了让抄写摩尔斯电码(Morse code)的电报员使用更方便。

举个例子,字母z和s、e离的很近,因为在美国摩尔斯电码中,z和se没有区别。收电报的人手指要在这些字母上游移,等着上下文才能明确意思。

所以,快蹄键盘的设计宗旨并不是让我们打字更慢,但是,它也不是为了让我们打字更方便而设计的。

既然如此,我们为什么还是要一百年如一日孜孜不倦地用下去呢?

美国军火商雷明登购买了肖尔斯的专利,定版设计后将产品投入市场,定价125美元,换算成今天的价格大概是3000美元。那些后来用打字机的秘书们要辛辛苦苦做好几个月才能挣到这么多钱。

当时,这并不是市场上唯一的打字机,肖尔斯被称作“发明打字机的第52个人”。但是,他的快蹄键盘在随后的竞争中胜出。

雷明登公司很会做生意,卖打字机的同时开打字培训班,1893年和另外4个重要对手合并,一致采用后来所称的“通用版”键盘。

1880年代美国争夺市场主宰的这场短平快战役,决定了我们今天所用的iPad的键盘布局。

当时,没有人为我们着想,但是,他们的行动控制着我们的选择。

太可惜了。因为,确实有更逻辑的键盘排版,最明显的可能要算德沃夏克(Dvorak)键盘。

这款键盘1932年时由奥古斯特·德沃夏克(August Devorak)设计并申请专利。

它更偏向使用我们的优势手(有左手和右手两种版本),并且将最常用的字母安排在一起。

1940年代美国海军的一项研究显示,德沃夏克的确非常、非常优秀:培训打字员使用德沃夏克键盘经济上更合算。

那么,为什么我们不转用德沃夏克键盘呢?问题在于:如何协调转换工作。

德沃夏克出生之前很长时间,快蹄就一直是通用键盘。

许多打字员学的都是快蹄。任何雇主要投资购买昂贵的打字机,肯定会选择最多打字员都会用的那种。还有,市场规模使快蹄成为价格最为低廉的打字机。