प्रियंका गांधी को कांग्रेस की तरफ से उत्तर प्रदेश का प्रभार दिए जाने के बाद से सियासी गलियारों में कयासों का दौर जारी है, अनेकों प्रकार की चर्चाओं की बाढ़ सी आ गई है. इन तमाम सियासी चर्चाओं की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हो रही लेकिन पार्टी दफ्तर और नेताओं की बातचीत से कयासों और अटकलों का बाजार जरूर गर्म हो रहा है.
चर्चा है कि प्रियंका गांधी का एक दफ्तर इलाहाबाद के जवाहर भवन में भी होगा और वह उसी कमरे में बैठेंगी जहां कभी इंदिरा गांधी बैठा करती थीं. लखनऊ में पार्टी मुख्यालय को नया रूप दिया गया है और इसमें पहली मंजिल पर एक छोटा लेकिन खूबसूरत दफ्तर भी बनाया गया है जो फिलहाल पार्टी के अध्यक्ष का है. इस दफ्तर से एक पुरानी सीढ़ी नीचे उतरती है जो कभी इस्तेमाल हुआ करती थी. चर्चा यह है कि प्रियंका गांधी सीढ़ी और इस पहली मंजिल के कमरे को अपने दफ्तर के तौर पर इस्तेमाल करेंगी और वह खास सीढ़ी का इस्तेमाल सिर्फ प्रियंका और उनके करीबी नेता कर पाएंगे.
चर्चा यह भी है कि 4 फरवरी को दोनों भाई-बहन राहुल और प्रियंका लखनऊ में पार्टी दफ्तर में प्रेस कॉन्फ्रेंस करेंगे जिसके लिए बड़े कॉन्फ्रेंस हॉल को आखिरी रूप दिया जा रहा है. इस बात के भी कयास लगाए जा रहे हैं कि प्रियंका गांधी पूर्वी उत्तर प्रदेश में प्रधानमंत्री मोदी को घेरेंगी और चुनाव भी लड़ सकती हैं. माना जा रहा है कि प्रियंका गांधी अमेठी से चुनाव लड़ेंगी जबकि राहुल गांधी छिंदवाड़ा सीट से लड़ेंगे.
एक बड़ी चर्चा यह भी है कि राहुल गांधी फरवरी के पहले पखवाड़े में किसी दिन संगम में डुबकी लगाएंगे और कांग्रेस के ब्राह्मण कार्ड को एक बार फिर मजबूती देंगे. बता दें कि कांग्रेस पार्टी ने संगम किनारे एक बड़ी जगह पार्टी के प्रचार के लिए ले रखी है. एक बार फिर साफ कर दें कि इन तमाम चर्चाओं की कोई पुष्टि आधिकारिक तौर पर न तो पार्टी कर रही है ना ही कोई बड़ा नेता. ऐसे में इन चर्चाओं में कुछ सच्चाई और कुछ कयासबाजी दोनों हो सकती है.
बताते चलें कि करण जौहर के चैट शो कॉफी विद करण में पिछले दिनों क्रिकेटर हार्दिक पंड्या और केएल राहुल ने शिरकत की थी. इस दौरान महिलाओं को लेकर की उनकी टिप्पणियों पर विवाद हुआ, जिसके बाद दोनों क्रिकेटर्स पर बीसीसीआई की ओर से कार्रवाई की खबरें आईं. दोनों को काफी आलोचना झेलनी भी पड़ी थी.
बिहार सरकार में मंत्री झा ने कहा कि कुछ लोग उनकी तुलना इंदिरा गांधी से कर रहे हैं, इंदिरा गांधी फिरोज शाह की पत्नी थी उनके पति ने लोकसभा में कई मुद्दों को उठाया था. लेकिन रॉबर्ट वाड्रा के नाम पर जमीन घोटाले हैं, ऐसे में प्रियंका की तुलना इंदिरा से करना गलत है. आपको बता दें कि विनोद नारायण झा बीजेपी नेता हैं और बिहार की नीतीश कुमार सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं.
उनके अलावा बिहार के उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने भी प्रियंका गांधी की राजनीति में एंट्री पर कहा कि उन्हें सपा-बसपा को डराने के लिए लाया गया है. उन्होंने कहा कि प्रियंका राजनीति में रॉबर्ट वाड्रा की प्रतिनिधि के तौर पर आई हैं. इससे रॉबर्ट वाड्रा का मुद्दा लाइमलाइट में आएगा.
गौरतलब है कि बुधवार को कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने अपनी बहन प्रियंका गांधी वाड्रा को पार्टी का महासचिव नियुक्त किया. प्रियंका गांधी को लोकसभा चुनाव के तहत पूर्वी उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी दी गई है. इस प्रकार के कयास लगाए जा रहे हैं कि प्रियंका गांधी लोकसभा चुनाव भी लड़ सकती हैं.
Friday, January 25, 2019
Thursday, January 17, 2019
चुनावी साल में होगी सौगातों की बौछार, इस बार अंतरिम नहीं पूर्ण बजट पेश कर सकती है मोदी सरकार
इस बात को लेकर काफी कयास लगाए जा रहे हैं कि इस बार 1 फरवरी को जब वित्त मंत्री बजट पेश करेंगे तो वह लेखानुदान (अंतरिम बजट) होगा या बीजेपी सरकार परंपरा को तोड़ते हुए पूर्ण बजट पेश करेगी. ऐसा कहा जा रहा है कि एनडीए सरकार इस बार पूर्ण बजट पेश करेगी, यह भरोसा जताने के लिए कि 2019 के आम चुनाव में जीतकर वह फिर से सत्ता में आएगी. यह माना जा रहा है कि इस बजट में कई लोकलुभावन घोषणाएं की जा सकती हैं.
वित्त मंत्रालय और भारत सरकार के हाल के ट्वीट देखें तो यह बात साफ नजर आती है. ऐसे कई ट्वीट में आगामी एक फरवरी को 'केंद्रीय बजट' या 'बजट 2019' पेश करने की बात कही गई है, जबकि पहले ऐसे अंतरिम बजट के लिए ज्यादा स्वीकार्य 'वोट-आन-अकाउंट' (लेखानुदान) शब्द का इस्तेमाल किया जाता था. यहां तक कि सोशल मीडिया के हैशटैग्स में भी #Budget2019 लिखा गया है.
इस वजह से बनी परंपरा
गौरतलब है कि आम परंपरा यह रही है कि चुनाव के साल में सरकार लेखानुदान या अंतरिम बजट पेश करती रही है. यह असल में नैतिकता का मसला है. जाने वाली सरकार तब तक के खर्च के लिए लेखानुदान पेश करती है और इस पर संसद की इजाजत लेती है, जब तक कि नई सरकार का बजट नहीं आता. सरकार आने वाली सरकार पर अपनी नीतियां नहीं थोपना चाहती. हो सकता है चुनाव के बाद जो नई सरकार आए उसे पिछली सरकार की नीतियां पसंद न आएं और वह इसे पूरी तरह से पलट दे. इसलिए यह परंपरा बन गई है कि किसी भी सरकार का अंतिम यानी चुनाव के साल वाला बजट अंतरिम बजट होता है और चुनाव के बाद जो सरकार आती है, वह पूर्ण बजट पेश करती है.
उद्योग जगत को मिले संकेत
लेकिन शायद इस बार सरकार ऐसे किसी बंधन में नहीं बंधने वाली. पिछले कुछ हफ्तों से उद्योग चैंबर्स, कॉरपोरेट जगत, एकाउंटेंट्स, कंसल्टेंट्स आदि सरकार से मिलकर बजट पर अपनी विशलिस्ट या सलाह दे रहे हैं और इन बैठकों से लौटने वाले लोगों में यह राय बनती दिख रही है कि सरकार उसी तरह से पूर्ण बजट पेश करने जा रही है जैसा कि पिछले वर्षों में किया गया. उसी तरीके से बजट भाषण होगा, यानी इस बार भी बजट में सरकार लोगों को टैक्स स्लैब में बदलाव, नई स्कीम, छूट, नई घोषणाओं का तोहफा दे सकती है.
एक शीर्ष उद्योग चैंबर के प्रमुख कहते हैं, 'सरकार यह संकेत देने की कोशिश करेगी कि आप यदि फिर से इस सरकार को चुनेंगे तो जो कुछ बताया जा रहा है, वह मिलेगा.' तो सरकार इस बार बजट में कर रियायतों (जैसे इनकम टैक्स छूट की सीमा 5 लाख करने), उत्पाद शुल्क में बदलाव, नई योजनाओं और नई घोषणाओं पर जोर दे सकती है.
उद्योग चैंबर्स का कहना है कि तमाम सेक्टर के लोगों ने इस बार यह मानकर सरकार को अपनी सिफारिश नहीं भेजी थी कि चुनावी साल में अंतरिम बजट ही आएगा. लेकिन सरकार की तरफ से कुछ काफी उत्साह दिखाते हुए सिफारिशें मांगी गईं. उद्योग जगत इसके लिए तैयार नहीं था और कई उद्योग संगठनों को तो युद्ध स्तर पर रातोरात सिफारिशें तैयार करानी पड़ीं.
इसके पहले अगर इतिहास पर गौर करें तो 1991 में चंद्रशेखर की सरकार में वित्त मंत्र रहे यशवंत सिन्हा ने लेखानुदान में सार्वजनिक कंपनियों के विनिवेश करने जैसी बड़ी घोषणा की थी. यही नहीं फरवरी, 2014 में यूपीए सरकार का अंतरिम बजट पेश करते हुए तत्कालीन वित्त मंत्री पी. चिदम्बरम ने भी कार, बाइक सहित कई चीजों पर उत्पाद शुल्क में कटौती की घोषणा की थी.
वित्त मंत्रालय और भारत सरकार के हाल के ट्वीट देखें तो यह बात साफ नजर आती है. ऐसे कई ट्वीट में आगामी एक फरवरी को 'केंद्रीय बजट' या 'बजट 2019' पेश करने की बात कही गई है, जबकि पहले ऐसे अंतरिम बजट के लिए ज्यादा स्वीकार्य 'वोट-आन-अकाउंट' (लेखानुदान) शब्द का इस्तेमाल किया जाता था. यहां तक कि सोशल मीडिया के हैशटैग्स में भी #Budget2019 लिखा गया है.
इस वजह से बनी परंपरा
गौरतलब है कि आम परंपरा यह रही है कि चुनाव के साल में सरकार लेखानुदान या अंतरिम बजट पेश करती रही है. यह असल में नैतिकता का मसला है. जाने वाली सरकार तब तक के खर्च के लिए लेखानुदान पेश करती है और इस पर संसद की इजाजत लेती है, जब तक कि नई सरकार का बजट नहीं आता. सरकार आने वाली सरकार पर अपनी नीतियां नहीं थोपना चाहती. हो सकता है चुनाव के बाद जो नई सरकार आए उसे पिछली सरकार की नीतियां पसंद न आएं और वह इसे पूरी तरह से पलट दे. इसलिए यह परंपरा बन गई है कि किसी भी सरकार का अंतिम यानी चुनाव के साल वाला बजट अंतरिम बजट होता है और चुनाव के बाद जो सरकार आती है, वह पूर्ण बजट पेश करती है.
उद्योग जगत को मिले संकेत
लेकिन शायद इस बार सरकार ऐसे किसी बंधन में नहीं बंधने वाली. पिछले कुछ हफ्तों से उद्योग चैंबर्स, कॉरपोरेट जगत, एकाउंटेंट्स, कंसल्टेंट्स आदि सरकार से मिलकर बजट पर अपनी विशलिस्ट या सलाह दे रहे हैं और इन बैठकों से लौटने वाले लोगों में यह राय बनती दिख रही है कि सरकार उसी तरह से पूर्ण बजट पेश करने जा रही है जैसा कि पिछले वर्षों में किया गया. उसी तरीके से बजट भाषण होगा, यानी इस बार भी बजट में सरकार लोगों को टैक्स स्लैब में बदलाव, नई स्कीम, छूट, नई घोषणाओं का तोहफा दे सकती है.
एक शीर्ष उद्योग चैंबर के प्रमुख कहते हैं, 'सरकार यह संकेत देने की कोशिश करेगी कि आप यदि फिर से इस सरकार को चुनेंगे तो जो कुछ बताया जा रहा है, वह मिलेगा.' तो सरकार इस बार बजट में कर रियायतों (जैसे इनकम टैक्स छूट की सीमा 5 लाख करने), उत्पाद शुल्क में बदलाव, नई योजनाओं और नई घोषणाओं पर जोर दे सकती है.
उद्योग चैंबर्स का कहना है कि तमाम सेक्टर के लोगों ने इस बार यह मानकर सरकार को अपनी सिफारिश नहीं भेजी थी कि चुनावी साल में अंतरिम बजट ही आएगा. लेकिन सरकार की तरफ से कुछ काफी उत्साह दिखाते हुए सिफारिशें मांगी गईं. उद्योग जगत इसके लिए तैयार नहीं था और कई उद्योग संगठनों को तो युद्ध स्तर पर रातोरात सिफारिशें तैयार करानी पड़ीं.
इसके पहले अगर इतिहास पर गौर करें तो 1991 में चंद्रशेखर की सरकार में वित्त मंत्र रहे यशवंत सिन्हा ने लेखानुदान में सार्वजनिक कंपनियों के विनिवेश करने जैसी बड़ी घोषणा की थी. यही नहीं फरवरी, 2014 में यूपीए सरकार का अंतरिम बजट पेश करते हुए तत्कालीन वित्त मंत्री पी. चिदम्बरम ने भी कार, बाइक सहित कई चीजों पर उत्पाद शुल्क में कटौती की घोषणा की थी.
Wednesday, January 9, 2019
फर्स्ट वीकेंड कितना कम सकती है सर्जिकल स्ट्राइक पर बनी फिल्म?
रिपब्लिक डे से पहले 11 जनवरी को बॉक्स ऑफिस पर अलग-अलग जोनर की दो बड़ी फिल्में रिलीज हो रही हैं. दि एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर के साथ सर्जिकल स्ट्राइक की सच्ची घटना पर बनी फिल्म 'उरी' भी रिलीज को तैयार है. देशभक्ति के मसाले से भरपूर मूवी का निर्देशन आदित्य धर ने किया है. उरी से वे बतौर निर्देशक डेब्यू कर रहे हैं. मल्टीस्टारर मूवी में विक्की कौशल, परेश रावल, यामी गौतम, मोहित रैना लीड रोल में हैं.
फिल्म 28-29 सितंबर 2016 को भारतीय सेना की ओर से LoC के उस पार किए गए सर्जिकल स्ट्राइक पर आधारित है. पीएम नरेंद्र मोदी की सरकार में हुई सर्जिकल स्ट्राइक की काफी चर्चा हुई थी. सर्जिकल स्ट्राइक के कई वीडियो भी सामने आए थे. अब आर्मी ऑपरेशन के बैकड्रॉप में सच्ची घटना पर आने वाली फिल्म लोगों की दिलचस्पी के केंद्र में है. माना जा रहा है कि ये फिल्म बॉक्स ऑफिस पर निर्माताओं के लिए फायदे का सौदा साबित हो सकती है.
शुरुआती हफ्ते में फिल्म के कलेक्शन की अनुमानित रिपोर्ट्स सामने आ रही हैं. इन फिल्म ट्रेड रिपोर्ट्स की मानें तो पहले दिन ये फिल्म भारतीय बाजार में 3.50 से 4 करोड़ रुपये तक का बिजनेस कर सकती है. बॉलीवुड हंगामा ने अनुमान लगाया है कि पहले वीकेंड में ये फिल्म 12 करोड़ के आसपास कमाई कर सकती है.
क्यों बॉक्स ऑफिस पर चलेगी उरी?
दरअसल, मिलिट्री ड्रामा मूवी के टिकट खिड़की पर अच्छा कारोबार करने की बड़ी वजह फिल्म का सब्जेक्ट है. यूं तो आर्मी बैकड्रॉप पर हर साल कई फिल्में रिलीज होती हैं, लेकिन 'उरी' उन सभी से अलग है. सर्जिकल स्ट्राइक की सच्ची घटना को फिल्म का सब्जेक्ट बनाना ही सबसे बड़ा मास्टरस्ट्रोक है. ये कंटेंट सिनेमाहॉल में दर्शकों की भारी भीड़ जुटाने का दम रखता है. रिपब्लिक डे के मौके पर देशभक्ति में रमे मूवी लवर्स के लिए उरी परफेक्ट ट्रीट है.
किस तरह से भारतीय सेना के जवानों ने पाक अधिकृत कश्मीर में बैठे आतंकियों के लॉन्चिंग कैम्प्स को तबाह किया था, इस मंजर को पर्दे पर देखने देखने के लिए हर भारतीय एक्साइटेड होगा. जिन्हें युद्ध पृष्ठभूमि की फ़िल्में देखने का शौक है वो जरूर इस मूवी को देखने थियेटर पहुंचेंगे.
मूवी को लेकर बने buzz और ट्रेड एनालिस्ट के अनुमानित आंकड़ों से फिल्म के बॉक्स ऑफिस पर अच्छी कमाई के आसार हैं. बाकी का काम वर्ड ऑफ माउथ पर निर्भर करेगा. अगर फिल्म अच्छी बनी होगी तो इसका हिट होना तय है. सर्जिकल स्ट्राइक, आर्मी बैकड्रॉप के अलावा विक्की कौशल और मोहित रैना की अदाकारी देखने के लिए भी दर्शक थियेटर्स का रुख कर सकते हैं. संजू, मनमर्जियां और राजी में विक्की ने अपनी एक्टिंग से सरप्राइज किया था. उरी में वे पहली बार फौजी का रोल निभा रहे हैं.
फिल्म को कम बजट में बनाया गया है. उरी में एक्शन सीन्स की भरमार है. सीन्स को रियल दिखाने की कोशिश की गई है. कुल मिलाकर, दर्शकों को कम बजट में हाई लेवल एक्शन देखने को मिलेगा.
क्या है फिल्म की कहानी
फिल्म 2016 मेें कश्मीर के उरी आर्मी बेस कैंप पर हुए आतंकी हमले पर आधारित है. पाकिस्तान प्रायोजित आतंकियों के हमले में 19 भारतीय जवान शहीद हो गए थे. उरी हमले के कुछ दिनों बाद 28-29 सितंबर की रात भारतीय सेना ने PoK में एक बड़ा ऑपरेशन चलाकर आतंकियों के ट्रेनिंग और लॉन्चिंग पैड तबाह किए थे. बाद में भारतीय सेना ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर सीमा पर हुए सर्जिकल स्ट्राइक की जानकारी दी थी. स्ट्राइक से जुड़े वीडियो भी सामने आए थे. हालांकि पाकिस्तान ने भारत की ओर से स्ट्राइक के दावों को खारिज कर चुका है.
फिल्म 28-29 सितंबर 2016 को भारतीय सेना की ओर से LoC के उस पार किए गए सर्जिकल स्ट्राइक पर आधारित है. पीएम नरेंद्र मोदी की सरकार में हुई सर्जिकल स्ट्राइक की काफी चर्चा हुई थी. सर्जिकल स्ट्राइक के कई वीडियो भी सामने आए थे. अब आर्मी ऑपरेशन के बैकड्रॉप में सच्ची घटना पर आने वाली फिल्म लोगों की दिलचस्पी के केंद्र में है. माना जा रहा है कि ये फिल्म बॉक्स ऑफिस पर निर्माताओं के लिए फायदे का सौदा साबित हो सकती है.
शुरुआती हफ्ते में फिल्म के कलेक्शन की अनुमानित रिपोर्ट्स सामने आ रही हैं. इन फिल्म ट्रेड रिपोर्ट्स की मानें तो पहले दिन ये फिल्म भारतीय बाजार में 3.50 से 4 करोड़ रुपये तक का बिजनेस कर सकती है. बॉलीवुड हंगामा ने अनुमान लगाया है कि पहले वीकेंड में ये फिल्म 12 करोड़ के आसपास कमाई कर सकती है.
क्यों बॉक्स ऑफिस पर चलेगी उरी?
दरअसल, मिलिट्री ड्रामा मूवी के टिकट खिड़की पर अच्छा कारोबार करने की बड़ी वजह फिल्म का सब्जेक्ट है. यूं तो आर्मी बैकड्रॉप पर हर साल कई फिल्में रिलीज होती हैं, लेकिन 'उरी' उन सभी से अलग है. सर्जिकल स्ट्राइक की सच्ची घटना को फिल्म का सब्जेक्ट बनाना ही सबसे बड़ा मास्टरस्ट्रोक है. ये कंटेंट सिनेमाहॉल में दर्शकों की भारी भीड़ जुटाने का दम रखता है. रिपब्लिक डे के मौके पर देशभक्ति में रमे मूवी लवर्स के लिए उरी परफेक्ट ट्रीट है.
किस तरह से भारतीय सेना के जवानों ने पाक अधिकृत कश्मीर में बैठे आतंकियों के लॉन्चिंग कैम्प्स को तबाह किया था, इस मंजर को पर्दे पर देखने देखने के लिए हर भारतीय एक्साइटेड होगा. जिन्हें युद्ध पृष्ठभूमि की फ़िल्में देखने का शौक है वो जरूर इस मूवी को देखने थियेटर पहुंचेंगे.
मूवी को लेकर बने buzz और ट्रेड एनालिस्ट के अनुमानित आंकड़ों से फिल्म के बॉक्स ऑफिस पर अच्छी कमाई के आसार हैं. बाकी का काम वर्ड ऑफ माउथ पर निर्भर करेगा. अगर फिल्म अच्छी बनी होगी तो इसका हिट होना तय है. सर्जिकल स्ट्राइक, आर्मी बैकड्रॉप के अलावा विक्की कौशल और मोहित रैना की अदाकारी देखने के लिए भी दर्शक थियेटर्स का रुख कर सकते हैं. संजू, मनमर्जियां और राजी में विक्की ने अपनी एक्टिंग से सरप्राइज किया था. उरी में वे पहली बार फौजी का रोल निभा रहे हैं.
फिल्म को कम बजट में बनाया गया है. उरी में एक्शन सीन्स की भरमार है. सीन्स को रियल दिखाने की कोशिश की गई है. कुल मिलाकर, दर्शकों को कम बजट में हाई लेवल एक्शन देखने को मिलेगा.
क्या है फिल्म की कहानी
फिल्म 2016 मेें कश्मीर के उरी आर्मी बेस कैंप पर हुए आतंकी हमले पर आधारित है. पाकिस्तान प्रायोजित आतंकियों के हमले में 19 भारतीय जवान शहीद हो गए थे. उरी हमले के कुछ दिनों बाद 28-29 सितंबर की रात भारतीय सेना ने PoK में एक बड़ा ऑपरेशन चलाकर आतंकियों के ट्रेनिंग और लॉन्चिंग पैड तबाह किए थे. बाद में भारतीय सेना ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर सीमा पर हुए सर्जिकल स्ट्राइक की जानकारी दी थी. स्ट्राइक से जुड़े वीडियो भी सामने आए थे. हालांकि पाकिस्तान ने भारत की ओर से स्ट्राइक के दावों को खारिज कर चुका है.
Tuesday, January 1, 2019
नए साल में आप पर 62 हजार रुपये का कर्ज, जानिए कैसे
नए साल की शुरुआत हो चुकी है. नए साल में हर किसी की यही कोशिश होगी कि वह फाइनेंशियल तौर पर मजबूत हो लेकिन यह जानकर हैरानी होगी कि भारत के हर व्यक्ति पर औसतन 62 हजार रुपये से ज्यादा का कर्ज है. यह कर्ज कैसे और क्यों है, इसका गणित हम आपको समझाते हैं.
दरअसल, हाल ही में वित्त मंत्रालय के सरकार कर्ज प्रबंधन ने तिमाही रिपोर्ट दी है. इस रिपोर्ट में बताया गया है कि सरकार का कुल कर्ज सितंबर के अंत तक बढ़कर 82 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया है. देश की 134 करोड़ की आबादी के हिसाब से गणना करें तो हर नागरिक पर करीब 62 हजार रुपये का कर्ज है. रिपोर्ट के मुताबिक इसी साल जून के अंत तक सरकार पर यह कर्ज 79.8 लाख करोड़ रुपये था. वहीं तब इसी आबादी के अनुसार आप पर कर्ज 59 हजार 552 रुपये था. यानी सिर्फ तीन महीनों में आप पर 2,448 रुपये का कर्ज बढ़ा है. वहीं सरकार पर इन तीन महीने में 2.2 लाख करोड़ रुपये का अतिरिक्त कर्ज बढ़ा है.
क्यों बढ़ा कर्ज
वित्त मंत्रालय की इस रिपोर्ट की मानें तो सरकार पर कर्ज बढ़ने की कई वजह हैं. पहली सबसे बड़ी वजह कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि है. इसके अलावा डॉलर के खिलाफ रुपये के मूल्य में गिरावट और अमेरिकी फेड-भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा दरों में बढ़ोतरी से भी देनदारी में बढ़ोतरी हुई है. रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि करीब 26.6 फीसदी बकाया सिक्युरिटीज की मैच्योरिटी अवधि पांच साल से कम है. जबकि साल 2018 के सितंबर अंत तक 41.4 फीसदी कॉमर्शियल बैंकों के लिए और 24.6 फीसदी इंश्योरेंस कंपनियों के लिए देनदारी है.
वहीं 10 साल की मैच्योरिटी वाली सरकारी बांडों पर यील्ड 11 सितंबर, 2018 को बढ़कर 8.18 प्रतिशत पर पहुंच गई. वहीं 11 साल की मैच्योरिटी अवधि वाली बांडों को छोड़ अन्य सभी बांडों पर यील्ड वृद्धि हुई है. बांड पर मिलने वाले रिटर्न या कमाई को यील्ड कहते हैं. बांड यील्ड में जोखिम कम होता है इसलिए इसमें रिटर्न भी कम होता है.
यह कर्ज अभी और बढ़ेगा!
सरकार या आप पर यह कर्ज अभी और बढ़ने वाला है. दरअसल, अमेरिका की आर्थिक नीतियों की निगरानी करने वाली संस्था रिजर्व फेड ने हाल ही में ब्याज दरों में बढ़ोतरी की थी. इसके साथ ही इस बात के संकेत दिए थे कि आने वाले दिनों में ब्याज दरों में फिर बढ़ोतरी की जा सकती है. बढ़ोतरी के इस संकेत का असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है. हालांकि रिजर्व बैंक ब्याज दरों में कटौती कर इस कर्ज को रिकवर करने में मदद कर सकता है.
कर्ज बढ़ता गया तो आप पर क्या असर होगा
अगर कर्ज बढ़ता गया तो इसका असर महंगाई के जरिए होगा. आरबीआई का भी मानना है कि आने वाले वर्ष में महंगाई का खतरा बढ़ रहा है. दरअसल, बीते महीने मौद्रिक समीक्षा नीति के बाद आरबीआई द्वारा जारी किए गए समीक्षा ब्यौरा में तत्कालीन गवर्नर उर्जित पटेल ने कहा कि जहां वित्त वर्ष 2018-19 के दूसरी छमाही में महंगाई 2.7 से 3.2 फीसदी हो सकती है वहीं वित्त वर्ष 2019-20 की पहली तिमाही के दौरान यह 3.8 से 4.2 फीसदी हो सकती है. ऐसे में इसका असर आपकी जेब पर पड़ सकता है.
दरअसल, हाल ही में वित्त मंत्रालय के सरकार कर्ज प्रबंधन ने तिमाही रिपोर्ट दी है. इस रिपोर्ट में बताया गया है कि सरकार का कुल कर्ज सितंबर के अंत तक बढ़कर 82 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया है. देश की 134 करोड़ की आबादी के हिसाब से गणना करें तो हर नागरिक पर करीब 62 हजार रुपये का कर्ज है. रिपोर्ट के मुताबिक इसी साल जून के अंत तक सरकार पर यह कर्ज 79.8 लाख करोड़ रुपये था. वहीं तब इसी आबादी के अनुसार आप पर कर्ज 59 हजार 552 रुपये था. यानी सिर्फ तीन महीनों में आप पर 2,448 रुपये का कर्ज बढ़ा है. वहीं सरकार पर इन तीन महीने में 2.2 लाख करोड़ रुपये का अतिरिक्त कर्ज बढ़ा है.
क्यों बढ़ा कर्ज
वित्त मंत्रालय की इस रिपोर्ट की मानें तो सरकार पर कर्ज बढ़ने की कई वजह हैं. पहली सबसे बड़ी वजह कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि है. इसके अलावा डॉलर के खिलाफ रुपये के मूल्य में गिरावट और अमेरिकी फेड-भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा दरों में बढ़ोतरी से भी देनदारी में बढ़ोतरी हुई है. रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि करीब 26.6 फीसदी बकाया सिक्युरिटीज की मैच्योरिटी अवधि पांच साल से कम है. जबकि साल 2018 के सितंबर अंत तक 41.4 फीसदी कॉमर्शियल बैंकों के लिए और 24.6 फीसदी इंश्योरेंस कंपनियों के लिए देनदारी है.
वहीं 10 साल की मैच्योरिटी वाली सरकारी बांडों पर यील्ड 11 सितंबर, 2018 को बढ़कर 8.18 प्रतिशत पर पहुंच गई. वहीं 11 साल की मैच्योरिटी अवधि वाली बांडों को छोड़ अन्य सभी बांडों पर यील्ड वृद्धि हुई है. बांड पर मिलने वाले रिटर्न या कमाई को यील्ड कहते हैं. बांड यील्ड में जोखिम कम होता है इसलिए इसमें रिटर्न भी कम होता है.
यह कर्ज अभी और बढ़ेगा!
सरकार या आप पर यह कर्ज अभी और बढ़ने वाला है. दरअसल, अमेरिका की आर्थिक नीतियों की निगरानी करने वाली संस्था रिजर्व फेड ने हाल ही में ब्याज दरों में बढ़ोतरी की थी. इसके साथ ही इस बात के संकेत दिए थे कि आने वाले दिनों में ब्याज दरों में फिर बढ़ोतरी की जा सकती है. बढ़ोतरी के इस संकेत का असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है. हालांकि रिजर्व बैंक ब्याज दरों में कटौती कर इस कर्ज को रिकवर करने में मदद कर सकता है.
कर्ज बढ़ता गया तो आप पर क्या असर होगा
अगर कर्ज बढ़ता गया तो इसका असर महंगाई के जरिए होगा. आरबीआई का भी मानना है कि आने वाले वर्ष में महंगाई का खतरा बढ़ रहा है. दरअसल, बीते महीने मौद्रिक समीक्षा नीति के बाद आरबीआई द्वारा जारी किए गए समीक्षा ब्यौरा में तत्कालीन गवर्नर उर्जित पटेल ने कहा कि जहां वित्त वर्ष 2018-19 के दूसरी छमाही में महंगाई 2.7 से 3.2 फीसदी हो सकती है वहीं वित्त वर्ष 2019-20 की पहली तिमाही के दौरान यह 3.8 से 4.2 फीसदी हो सकती है. ऐसे में इसका असर आपकी जेब पर पड़ सकता है.
Subscribe to:
Posts (Atom)