Thursday, November 22, 2018

J-K विधानसभा भंग होने के बाद PM मोदी से मिले राजनाथ, लोकसभा के साथ हो सकते हैं चुनाव

जम्मू-कश्मीर में चल रही राजनीतिक उथल-पुथल पर केंद्र सरकार की ओर से बयान सामने आया है. केंद्रीय गृह मंत्रालय के सूत्रों की मानें तो राज्यपाल सत्यपाल मलिक द्वारा विधानसभा भंग करने का फैसला पीडीपी-NC-कांग्रेस के सरकार बनाने की गतिविधि के दबाव में नहीं लिया गया है.

सूत्रों की मानें गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने बुधवार को अपने चुनावी दौरे से लौट कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की थी. इस बैठक में राज्य के हालात पर चर्चा हुई. बताया जा रहा है कि केंद्र सरकार का मानना है कि राज्य में अब चुनाव लोकसभा चुनाव के साथ ही हो सकते हैं.

केंद्रीय सूत्रों का ये भी मानना है कि विधानसभा पहले भी भंग हो सकती थी, लेकिन सुरक्षा कारणों और निकाय चुनाव के कारण नहीं हो पाई. वहीं अब पूरा फोकस निकाय चुनाव के बाकी बचे चरणों पर ही होगा.

गृह मंत्रालय के सूत्रों की मानें तो राज्यपाल द्वारा जम्मू-कश्मीर विधानसभा को भंग करने का निर्णय एक दिन पहले ही यानी मंगलवार को ले लिया गया था. मंगलवार को इसकी सारी प्रक्रिया पूरी हुई और बुधवार को इसका ऐलान कर दिया गया.

ये भी कहा जा रहा है कि सरकार बनाने के लिए कई पार्टियों की तरफ से खरीद-फरोख्त की कोशिशें की जा रही थीं, यही कारण रहा कि राज्यपाल को ये फैसला लेना पड़ा.

राज्यपाल पहले ही दे चुके हैं सफाई

आपको बता दें कि इससे पहले राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने भी अपने बयान में इस फैसले के कारणों को गिनाया था. राजभवन की ओर से जारी बयान में राज्यपाल ने कहा था कि उन्हें आशंका थी कि सरकार बनाने के लिए खरीद-फरोख्त हो सकती है, इसलिए उन्हें ये फैसला लेना पड़ा. उन्होंने ये भी कहा कि उन्हें महबूबा मुफ्ती या सज्जाद लोन की ओर से कोई खत नहीं मिला.

राजभवन ने बाद में एक बयान में कहा, ‘‘राज्यपाल ने यह निर्णय अनेक सूत्रों के हवाले से प्राप्त सामग्री के आधार पर लिया.’’ उन्होंने ये भी कहा कि जरूरी नहीं कि राज्य के चुनाव अभी हों, ये चुनाव लोकसभा चुनाव के साथ भी कराए जा सकते हैं.

Monday, November 5, 2018

जब आरबीआई से टकराए थे जवाहर लाल नेहरू

टाइम्स ऑफ़ इंडिया में छपी रिपोर्ट के मुताबिक मौजूदा नरेंद्र मोदी सरकार आरबीआई विवाद का हल ढूंढने के लिए भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की चिट्ठी का सहारा ले सकती है.

दरअसल भूतपूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू का भी रिज़र्व बैंक के तत्कालीन गवर्नर सर बेनेगल राम राव से मतभेद हुआ था. मतभेद का अंत बेनेगल राव के इस्तीफ़े से हुआ था.

आरबीआई के चौथे गवर्नर सर राव ने जनवरी 1957 में नेहरू सरकार से मतभेदों के बाद इस्तीफ़ा दे दिया था.

उस समय नेहरू ने राव की बजाय तत्कालीन वित्तमंत्री टीटी कृष्णामाचारी का साथ दिया था.

नेहरू ने राव को एक चिट्ठी लिखी थी जिसमें कहा गया था कि अगर उनके लिए काम जारी रखना मुमकिन नहीं है तो वो पद छोड़ सकते हैं. इसके कुछ ही दिनों बाद राव ने आरबीआई गवर्नर का पद छोड़ दिया था.

आरबीआई का काम सरकार को सलाह देना ज़रूर है, लेकिन इसे सरकार के साथ मिलकर चलना होगा.''

इन दिनों केंद्र की मोदी सरकार और रिज़र्व बैंक के गवर्नर उर्जित पटेल के बीच तनाव की ख़बरें मीडिया में छाई हुई हैं. ऐसी चर्चा भी थी कि सरकार आरबीआई एक्ट का सेक्शन-7 लागू करके इसकी स्वायत्तता पर लगाम लगाना चाहती है.

रिज़र्व बैंक के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य ने भी दो हफ़्ते पहले इशारों ही इशारों में सरकार पर निशाना साधा और कहा था कि सरकारों का केंद्रीय बैंक की स्वायत्तता का सम्मान न किया जाना ख़तरनाक साबित हो सकता है.

इकोनॉमिक टाइम्स में छपी ख़बर के मुताबिक कांग्रेस नेता शशि थरूर ने कहा है कि लोगों को राम को अपने दिल में बसाना चाहिए.

राम मंदिर विवाद के बीच थरूर ने एक इंटरव्यू में कहा कि अगर राम दिल में हैं तो फिर इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि वो कहीं और हैं या नहीं क्योंकि असल में राम हर जगह हैं.

शशि थरूर के मोदी पर बयान से भड़की बीजेपी
शशि थरूर की 'कच्ची हिंदी' सुनी है आपने?
शशि थरूर...यू आर अ गुड क्वेश्चन
पिछले कुछ वक़्त से शशि थरूर अपने बयानों से लगातार सुर्खियों में बने हुए हैं. इससे पहले उन्होंने संघ के एक अनाम सूत्र का हवाला देते हुए कहा था कि @प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शिवलिंग पर बैठे उस बिच्छू की तरह हैं जिसे न तो हाथ से हटाया जा सकता है और न चप्पल से मारा जा सकता है'.

इससे पहले थरूर ने कहा था कि एक अच्छा हिंदू किसी और के पूजा स्थल को ध्वस्त करके राम मंदिर नहीं बना सकता.

इंडियन एक्सप्रेस में छपी रिपोर्ट के मुताबिक कर्नाटक की कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन वाली सरकार टीपू सुल्तान की जयंती मनाना जारी रखेगी.

पिछले कुछ वर्षों में कर्नाटक में टीपू सुल्तान की जयंती को लेकर विवाद हुआ है. बीजेपी और इसके सहयोगी दल इसका विरोध करते हैं. उनका कहना है कि टीपू एक क्रूर, हिंदू विरोधी और कट्टर मुस्लिम शासक थे.

टीपू सुल्तान: नायक या जिहादी शासक
बीजेपी को टीपू सुल्तान से परहेज़ क्यों?
टीपू सुल्तान के रॉकेटों के ऐतिहासिक सबूत
वहीं, कर्नाटक सरकार 18वीं सदी के शासक टीपू सुल्तान को बहादुर और अंग्रेज़ों से लोहा लेने वाला बताकर उनकी जयंती मनाती आई है.

पिछले साल विवाद के बाद कर्नाटक हाई कोर्ट की एक खंड पीठ ने टीपू की जयंती मनाने पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था. इस साल फिर एक मामला हाई कोर्ट में दर्ज कराया गया है जिसकी सुनवाई 9 नवंबर को होनी है.