Monday, November 5, 2018

जब आरबीआई से टकराए थे जवाहर लाल नेहरू

टाइम्स ऑफ़ इंडिया में छपी रिपोर्ट के मुताबिक मौजूदा नरेंद्र मोदी सरकार आरबीआई विवाद का हल ढूंढने के लिए भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की चिट्ठी का सहारा ले सकती है.

दरअसल भूतपूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू का भी रिज़र्व बैंक के तत्कालीन गवर्नर सर बेनेगल राम राव से मतभेद हुआ था. मतभेद का अंत बेनेगल राव के इस्तीफ़े से हुआ था.

आरबीआई के चौथे गवर्नर सर राव ने जनवरी 1957 में नेहरू सरकार से मतभेदों के बाद इस्तीफ़ा दे दिया था.

उस समय नेहरू ने राव की बजाय तत्कालीन वित्तमंत्री टीटी कृष्णामाचारी का साथ दिया था.

नेहरू ने राव को एक चिट्ठी लिखी थी जिसमें कहा गया था कि अगर उनके लिए काम जारी रखना मुमकिन नहीं है तो वो पद छोड़ सकते हैं. इसके कुछ ही दिनों बाद राव ने आरबीआई गवर्नर का पद छोड़ दिया था.

आरबीआई का काम सरकार को सलाह देना ज़रूर है, लेकिन इसे सरकार के साथ मिलकर चलना होगा.''

इन दिनों केंद्र की मोदी सरकार और रिज़र्व बैंक के गवर्नर उर्जित पटेल के बीच तनाव की ख़बरें मीडिया में छाई हुई हैं. ऐसी चर्चा भी थी कि सरकार आरबीआई एक्ट का सेक्शन-7 लागू करके इसकी स्वायत्तता पर लगाम लगाना चाहती है.

रिज़र्व बैंक के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य ने भी दो हफ़्ते पहले इशारों ही इशारों में सरकार पर निशाना साधा और कहा था कि सरकारों का केंद्रीय बैंक की स्वायत्तता का सम्मान न किया जाना ख़तरनाक साबित हो सकता है.

इकोनॉमिक टाइम्स में छपी ख़बर के मुताबिक कांग्रेस नेता शशि थरूर ने कहा है कि लोगों को राम को अपने दिल में बसाना चाहिए.

राम मंदिर विवाद के बीच थरूर ने एक इंटरव्यू में कहा कि अगर राम दिल में हैं तो फिर इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि वो कहीं और हैं या नहीं क्योंकि असल में राम हर जगह हैं.

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पिछले कुछ वक़्त से शशि थरूर अपने बयानों से लगातार सुर्खियों में बने हुए हैं. इससे पहले उन्होंने संघ के एक अनाम सूत्र का हवाला देते हुए कहा था कि @प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शिवलिंग पर बैठे उस बिच्छू की तरह हैं जिसे न तो हाथ से हटाया जा सकता है और न चप्पल से मारा जा सकता है'.

इससे पहले थरूर ने कहा था कि एक अच्छा हिंदू किसी और के पूजा स्थल को ध्वस्त करके राम मंदिर नहीं बना सकता.

इंडियन एक्सप्रेस में छपी रिपोर्ट के मुताबिक कर्नाटक की कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन वाली सरकार टीपू सुल्तान की जयंती मनाना जारी रखेगी.

पिछले कुछ वर्षों में कर्नाटक में टीपू सुल्तान की जयंती को लेकर विवाद हुआ है. बीजेपी और इसके सहयोगी दल इसका विरोध करते हैं. उनका कहना है कि टीपू एक क्रूर, हिंदू विरोधी और कट्टर मुस्लिम शासक थे.

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वहीं, कर्नाटक सरकार 18वीं सदी के शासक टीपू सुल्तान को बहादुर और अंग्रेज़ों से लोहा लेने वाला बताकर उनकी जयंती मनाती आई है.

पिछले साल विवाद के बाद कर्नाटक हाई कोर्ट की एक खंड पीठ ने टीपू की जयंती मनाने पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था. इस साल फिर एक मामला हाई कोर्ट में दर्ज कराया गया है जिसकी सुनवाई 9 नवंबर को होनी है.

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